दिमागी उलझनों का पेट पर दुष्परिणाम #Mental Disorder #Stomach Deceases
क्या आपने कभी सोचा है कि अगर आपको पेट से रिलेटेड कोई प्रॉब्लम है तो उसके लिए आपका टेंशन या चिंताएं या दिमाग में कोई गड़बड़ी यह सारी चीजें पेट को इफेक्ट करती है अगर हमारा लाइफस्टाइल ऐसा है या फिर हमारे रिलेशनशिप में कोई प्रॉब्लम है तो हम स्ट्रेस में होते हैं और जब हम स्ट्रेस को मैनेज नहीं कर पाते हैं हमारी नींद को पूरा नही कर पाते हैं तो उसका सीधा सीधा असर हमारे पेट पर पड़ता है और पेट खराब होता है और पेट खराब होने से फिर हमारा दिमाग खराब होता है तो कहने का मतलब यह है कि अगर आप अपने पेट के लिए कोई ट्रीटमेंट कर रहे हैं तो उसके पहले आपको अपने स्ट्रेस को मैनेज करते आना चाहिए क्योंकि सबसे पहले तो हमारा दिमाग ही होता है दिमाग याने हमारा ब्रेन और वही पूरी बॉडी को चलाता है तो अगर उसमें कोई खराबी आ जाए उसमें कोई गड़बड़ी आ जाए उसके सिस्टम में कोई हलचल हो जाए और वह काफी लंबे समय तक बनी रहती है तो फिर हमें उसके दुष्परिणाम झेलने पड़ते हैं जब प्रॉब्लम छोटी होती है तो उसको हम पहचान नहीं पाते या उस और उतना ध्यान नही जाता कि किस वजह से यहां इफेक्ट हो रहा है पर धीरे धीरे काफी लंबे समय तक प्रॉब्लम होते रहती है तब हमें उसके मेजर इफेक्ट दिखने लगते हैं फिर हम क्या करते हैं पेट के लिए दवाई लेते हैं यह सारी चीजें करते हैं पर अगर हम मेडिटेशन करते हैं स्ट्रेस को मैनेज करने के लिए कोई ध्यान साधना या क्या फिर कोई अच्छा पावरफुल म्यूजिक सुनते हैं तो उससे हमारा दिमाग ठीक होगा और फिर दिमाग से अच्छे सिग्नल्स हमारे नर्वस सिस्टम तक पहुंचेंगे और उसके बाद में वहां पर धीरे-धीरे सारी गड़बड़िया ठीक होने लगती है तो कोई भी प्रॉब्लम हो हमको दिमाग को ठीक करने के लिए उपाय करने चाहिए और उपाय बहुत सिंपल है ।बहुत से प्रकार के मेडिटेशन होते हैं उसमें से कोई भी पद्धति जो आपको सूट करती है या फिर जिसमें आप विश्वास करते हैं वह अपनानी चाहिए और दिमाग की एक्सरसाइज हो जाती है मेडिटेशन हो जाता है अच्छा कोई सुंदर सा कोई शास्त्रीय संगीत सुनेंगे या फिर कोई गीत राग सुनेंगे,तो काफी हद तक हमको फायदा महसूस होता है
आपने देखा होगा या महसूस किया होगा कि जब हम टेंशन में रहते हैं चिंता में रहते हैं डरे हुए रहते हैं तो हमारी भूख मर जाती है खाना खाने की इच्छा नहीं होती और कभी कोई डरावना सीन हमने देख लिया कहीं पर लाइव देख लिया या टीवी पर देख लिया या फिरहमारे सामने कोई घटना हो रही हो तो अचानक से हमें अजीब सा फील होने लगता है ,उल्टी सी आने लगती है कुछ ऐसे शारीरिक वेग है जिन्हें हम रोक नहीं पाते हैं। ऐसी चीजें होती है कि हमारे ब्रेन में कुछ हलचल होती है तो उसका असर हमारी बॉडी पर तो होता ही है विशेषतः हमारे पेट में होता है। डेली लाइफ में हम देखते हैं कि जब हमारा दिमाग दो विपरीत परिस्थतियों या विचारों के बीच संघर्ष कर रहा होता है तो खाने के प्रति जो हमारे इंटरेस्ट है वह चला जाता है हमें किसी चीज में स्वाद नहीं आता हमें चिंता सताती है और वह सारी जो भावनाएं है नेगेटिव भावनाएं उससे हमारी भूख मर जाती है भोजन के लिए हमारे इंटरेस्ट खत्म हो जाता है और अगर यह परिस्थिति काफी दिनों तक बनी रहती है तो व्यक्ति बहुत दुबला हो जाएगा या तो फिर कोई गंभीर बीमारी का भी शिकार हो जाता है जो लड़कियां होती है या स्त्री वर्ग उनके मेंस्ट्रुएशन साइकिल या पीरियड में भी गड़बड़ी आ जाती है क्योंकि हारमोंस इमबैलेंस हो जाते हैं कब्ज की शिकायत हो जाती है पेट का ठीक तरह से साफ ना होना या पूरी तरह से साफ न होना और दूसरी तरफ इसका उल्टा भी होता है कि जैसे एक तरफ तो था कि चिंता की वजह से भूख नहीं लग रही है या अरुचि हो गई है खाने में दूसरी तरफ यह भी होता है कि बहुत ज्यादा खाना खाना स्टार्ट कर दिया है कितना भी खा रहे मन नहीं भर रहा है, पेट तो बहुत ज्यादा भर रहा है ओवरवेट हो रहे हैं बहुत ज्यादा बदहजमी हो रही है फिर भी खाने का मन करता रहता है ऐसे लोगों में यह भी यह देखा जाता है कि उनके जीवन में प्यार का अभाव, हर पल असुरक्षा की भावना, मानसिक द्वंद्व या खींचतान तनाव और डिप्रेशन इन सब के लक्षण देखने को मिलते हैं वह अपनी जो अधूरी इच्छाएं हैं वह ज्यादा भोजन करके पूरी करना चाहता है ये ऑटोमेटिक हो जाता है। बहुत ज्यादा डर ,गुस्सा, चिड़चिड़ापन अंदर ही अंदर घुटते रहना, चिंता करना यह सारी चीजें पेट में गैस भी पैदा कर देती है मितली आना डकार आना पेट साफ ना होना खाना ना पचना यह सारी चीजें भी इस मनोविकार की वजह से होती है ।तो कंटिन्यू बना रहने वाला यह मानसिक तनाव एसिडिटी भी पैदा करता है और कंटिन्यूसली अगर एसिडिटी होती है तो हमारे आंत के ऊपर जो परत होती है जिसको झिल्ली कहते हैं उसको भी डैमेज करती है और आगे जाकर वह अल्सर का रूप ले लेती है तो यानी कि सिर्फ एक चिंता, एक मानसिक तनाव और हमारे स्ट्रेस को मैनेज न कर पाना हमें काफी गंभीर बीमारियों की ओर ले जाता है ।तनाव, चिंताएं भय और भावनाओं की तृप्ति का न होना ये सारे मिलकर हमारी बड़ी आँत पर भी असर डालती हैं जिससे कब्ज की शिकायत होती है इन रोगियों में यह भी देखा जाता है कि वे बुद्धिमान तो काफी होते हैं परंतु विपरीत परिस्थितियों का लंबे समय से सामना कर रहे होने के कारण उनमें कमजोरी आ जाती है वे समस्याओं का डट कर सामना नहीं कर पाते और बहुत ज्यादा डिप्रेशन में चले जाते हैं, गुस्से वाले भी बन जाते हैं ।पेट को ठीक करना है तो उसका सीधा मार्ग है शुरुआत वहीं से करनी है कि दिमाग को ठीक करना है और उसके लिए मेडिटेशन सबसे अच्छा साधन है
परिस्थितियां हमारे हाथ में नहीं है बहुत सी बातें हैं जो हम नहीं कर सकते हैं नहीं पा सकते हैं एक चीज है जो हमारे वश में है कि हम हमारे दिमाग को शांत रखें और शांत रखने के लिए काफी सारी प्रक्रियाएं हैं ध्यान योग सबसे उत्तम है ध्यान से सारी स्थितियाँ ठीक हो सकती है
Excellent..worth reading
जवाब देंहटाएंThank for appreciation
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